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दिव्या मित्तल: जननीति भारत पार्टी से रखेंगी कदम

विकास को नई रफ्तार देने आई दिव्या मित्तल: जननीति भारत पार्टी से रखेंगी कदम

दिव्या मित्तल: जननीति भारत  पार्टी से रखेंगी कदम

यूपी की पूर्व IAS दिव्या मित्तल ने अपनी पार्टी बनाने का ऐलान किया है। पार्टी का नाम ‘जननीति भारत’ रखा है। गुरुवार दोपहर एक बजे फेसबुक पर वीडियो पोस्ट करके उन्होंने बताया कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में मिर्जापुर जिले की सदर सीट से चुनावी मैदान में उतरेंगी।

दिव्या मित्तल ने कहा- 

"जननीति भारत' में राज आपका होगा। जननीति भारत 2027 उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ेगी। 5 साल सरकार आपके हिसाब से चलेगी।"

30 सितंबर को दिव्या मित्तल ने राजनीति में एंट्री का ऐलान किया था। कहा था- यूपी में ही रहूंगी। डरूंगी नहीं, सवाल करूंगी। किसी पार्टी के साथ नहीं जुड़ूंगी। अकेले चलूंगी। मेरा मकसद राजनेता बदलना नहीं, बल्कि पूरी राजनीति बदलना है। मुझे पैसा और बाहुबल नहीं चाहिए।

2013 बैच की IAS रहीं दिव्या ने 30 अगस्त को इस्तीफा दिया था। उस समय वह राजस्व विभाग में विशेष सचिव थीं। 14 सितंबर को उनका इस्तीफा मंजूर हो गया।‌ दिव्या ने IIT दिल्ली से बीटेक और IIM बेंगलुरु से MBA करने के बाद लंदन में लाखों के पैकेज वाली नौकरी की थी।

दिव्या जी ने क्या-क्या कहा?
 

1. 'जननीति भारत' का पहला वचन- जन से नीति, नीति से भारत

दिव्या मित्तल ने कहा- मैं अपनी पार्टी बना रही हूं। आप पूछेंगे कि पार्टियों की कमी है क्या। कमी पार्टियों की नहीं है सुनवाई की है। गंगा के सामने खड़ी हूं, गंगाजी में सब बूंदें बराबर होती हैं। रास्ता सब मिलकर तय करती हैं। ऐसी ही पार्टी बनानी है, जिसमें हर व्यक्ति एक बूंद हो और हर बूंद का काम। ऐसी ही सोच से निकली पार्टी का नाम है 'जननीति भारत’।

"जननीति भारत' के तीन वचन हैं- देश की नीतियों के केंद्र में लोग होंगे और लोग ही नीतियां तय करेंगे। याद होगा देवकली देवी ने घर में पानी नहीं होने के बाद भी मुझसे स्कूल मांगा था, मेरे वीडियो के बाद स्कूल का काम शुरू हो गया। नींव डलनी शुरू हो गई, फिर पता चला कि जमीन जंगल की है, इसलिए काम रुक गया। जिस नींव पर बच्चों का भविष्य था, वह बच्चे आज भी इंतजार में हैं।

प्रश्न यह है कि जब देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों को रास्ता बनाना होता है तो जंगल 80 दिन में रास्ता देता है, लेकिन जब किसी गरीब के लिए स्कूल, रास्ता या कारखाना लगना होता है तो वह फाइल 80 सालों तक लटकी रहती हैं।

"दूसरी नीति न्याय, वहां जहां सुनवाई सबकी हो। जनता को न्याय कहां मिलना चाहिए, यह जनता से पूछिए, नीति कैसे बनती है, ये जनता से पूछिए। मां एक रोटी कम खाती है, लेकिन बच्चे का पेट भरती है। पिता अपने खर्च कम करता है, लेकिन बच्चे को स्कूल भेजता है, यह है सोच। हमारी नीति में यही सोच देखेगी 

खेती की नीति किसान के साथ। किसान को पता है कि खेत से लेकर मंडी तक क्या समस्या आ रही है, दाम कहां टूट रहा है, व्यापार की नीति छोटे व्यापारी तक, व्यापार से लेकर बंदरगाह तक उसे क्या समस्या आ रही है। लड़की आज घर की छत पर चांद देख रही है, एक दिन उसे पा लेगी।

“जननीति भारत' का पहला वचन, जन से नीति, नीति से भारत।

2. हर फैसला जरूरत देखकर होगा, पहचान देखकर नहीं

'जननीति भारत' का दूसरा वचन- हर फैसला जरूरत देखकर होगा, पहचान देखकर नहीं। एक सड़क बन रही थी, गांव में उम्मीद जगी, फिर किसी ने अंगुली रखकर सड़क की दिशा मोड़ दी। एक ओर हजारों लोगों को फायदा था, दूसरी ओर किसी एक को। सड़क दूसरी ओर गई, वहां सैकड़ों घर थे। आंगन उजड़ गए, घर टूट गए। जिसके लिए सड़क बनी, वह कोई था।

जननीति में उस नक्शे पर सबके लिए उंगली उठेगी, यदि कोई अंधेरा मोड़ है, जहां लड़कियों को गुजरने से डर लगता है, कहां पर टीका टिप्पणी होगी? मोबाइल एप से उस निशान को मार्क कर देंगे, जहां 100 निशान हो जाएं, वहां लाइट, गश्त और कैमरा रहेगा। निर्णय न पुलिस का न नेता का, बल्कि उन लड़कियों का। हैंडपंप हो, सड़क या खड़ंजा जहां सबसे पहले उंगली रखकर बताएंगे, काम वहां से शुरू होगा, न जाति न धर्म न हैसियत, सब मिलकर निर्णय करेंगे।

3. जरूरत से फैसला और फैसले में बराबरी

जननीति भारत का तीसरा वचन है- जरूरत से फैसला और फैसले में बराबरी। एक महिला ने पक्के मकान की अर्जी दी, महिला को नहीं पता कि मकान स्वीकृत हो गया है, बिचौलिया घर आकर कहता है कि अम्मा मैं करा दूंगा कि पांच हजार रुपए दे दो, यदि महिला को पहले पता चल जाएगा तो वहा बिचौलिया किसके द्वार जाएगा।

उस गांव में जितने भी काम होते हैं, किसी भी निधि से, मोबाइल पर देखने चाहिए। बच्चों को कॉपी जांचने के लिए दे दीजिए तो वह कहेगा सब कुछ ठीक है। खराब सड़क के बारे में सबसे पहले किसे पता चलता है, जो इस सड़क पर चलते है। यही है जननीति भारत का तीसरा वचन- जनता को हिसाब और हिसाब से सुधार।

4. हम साथ मिलकर लड़ाई को लड़ेंगे, राजनीति नहीं, जननीति करेंगे

जब सब कुछ आप ही करेंगे तो विधायक क्या करेंगे, 'जननीति भारत' के विधायक क्या करेंगे। विधायक का काम होगा आपके द्वार जाना। आज विधायक जनता और सरकार के बीच में बैठता है, लेकिन सरकार की ओर मुंह करके, 'जननीति भारत' में भी वहीं बैठेगा, लेकिन जनता की ओर मुंह करके। 

आप पूछेंगे कि इतना आसान है तो अब तक हुआ क्यों नहीं, फोन तो हर हाथ में है। टिकट फोन पर कटता है तो यह फोन पर क्यों नहीं हो रहा है, क्योंकि यहां सवाल सुविधा का नहीं है, बल्कि सत्ता का है।

मैंने पहले ही कहा था कि आप लोग सूरज है, सूरज को निकलने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है, जिस दिन सूरज निकलेगा, उस दिन राज जन-जन का होगा। इस पार्टी के पास न पैसा है, न विज्ञापन, इसलिए लड़ाई पोस्टर से नहीं, घर-घर से लड़ी जाएगी। हर घर एक दफ्तर और हर व्यक्ति प्रचारक।

मुझे भी अपने गांव या कस्बे में बुलाइए, हम साथ मिलकर लड़ाई को लड़ेंगे। मैंने पहले कहा था कि आप सूरज हैं, मैंने खिड़की खोली है, आप भी तीन खिड़की खोलो, इस वीडियो और मैसेज को तीन लोगों को भेजकर तीन शब्द लिखें- राजनीति नहीं, जननीति।

दिव्या ने कहा इस पार्टी के पास ना पैसा है ना ही विज्ञापन इसलिए लड़ाई पोस्ट से नहीं घर-घर से लड़ी जाएगी।

दिव्या मित्तल किसी राजनीतिक दल में क्यों शामिल नहीं हुईं? समझिए-

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यूपी में बड़े राजनीतिक दलों पर किसी न किसी तरह के आरोप हैं। क्षेत्रीय दल जाति आधारित है। इसलिए दिव्या ने किसी मौजूदा राजनीतिक दल को ज्वाइन करने की जगह अपना राजनीतिक दल बनाने का निर्णय किया है। दल का नाम भी ऐसा रखा है, जो जनता की उम्मीद और भरोसे से जुड़ा है।

. दिव्या किसी राजनीतिक दल से टिकट लेती तो वह स्वतंत्र राजनीति नहीं कर सकती थीं। वह जिस मकदस से राजनीति में आने का दावा कर रही हैं, उसे पूरा नहीं कर सकती थीं। राजनीतिक दल के दायरे, नीति और नियमों में बंधकर काम करना पड़ता, ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं था।
चुनाव में किसी दूसरी पार्टी के समर्थन का सवाल है तो यह तो वक्त बताएगा। यदि दिव्या की पार्टी का जनता में असर दिखा तो लोग ही नहीं, बल्कि राजनीतिक दल भी उनसे जुड़ने का प्रयास करेंगे। यदि जनता में उनका असर दिखाई नहीं दिया तो बड़े राजनीतिक दलों के नेता यह देखना चाहेंगे कि चुनाव में कितना असर दिखा पाती है।

मिर्जापुर की डीएम रहीं, लहुरियादह में पानी पहुंचाया था

दिव्या सितंबर, 2022 में मिर्जापुर की डीएम बनी थीं। वहां ग्रामीण इलाकों में जन-चौपाल और पीने के पानी से जुड़े कामों को लेकर उनकी चर्चा हुई थी। लहुरियादह गांव में पाइपलाइन से पानी पहुंचाने की पहल भी उनके कार्यकाल में हुई थी।

मिर्जापुर से तबादले के बाद भी उनकी विदाई चर्चा में रही। स्थानीय लोगों की मौजूदगी में उन्हें विदाई दी गई थी। इसके बाद देवरिया में भी उनका कार्यकाल चर्चा में रहा। वहां जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच अधिकारों को लेकर हुई बहस ने उन्हें फिर सुर्खियों में ला दिया था।

वही मिर्जापुर के आंतरिक हालात काफी जर्जर हो रखी हैं  मित्तल के आने से हो सकता है कुछ राजनीतिक प्रभाव पड़े और बदलाव की एक नई दिशा मिले मिर्जापुर के लिए! 

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